दनियावां में जल संकट गहराया: पर्यावरणविद बोले – “अब नहीं चेते तो अगली गर्मी में प्यासे रह जाएंगे लोग”*
*दनियावां में जल संकट गहराया: पर्यावरणविद बोले – “अब नहीं चेते तो अगली गर्मी में प्यासे रह जाएंगे लोग”*
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*डॉ राजीव नयन सिंह,नवबिहार टाइम्स,प्रतिनिधि, दनियावां, पटना*
*दनियावां,पटना* गर्मी बढ़ते ही दनियावां प्रखंड के 6 पंचायतों के 33 राजस्व ग्रामों में जल संकट की तस्वीरें साफ दिखने लगी हैं। सरोवर, कुएं और पोखर तेजी से सूख रहे हैं। पशु-पक्षियों के लिए पीने का पानी तक नहीं बच रहा। पर्यावरणप्रेमी औऱ फतुहा-दनियावां प्रखंड के जदयू नेता विशन कुमार बिट्टू का कहना है कि अगर अभी जल संरक्षण की दिशा में ठोस कदम नहीं उठे तो अगली गर्मी में दनियावां के कई गांवों को टैंकर पर निर्भर होना पड़ेगा।
श्री बिट्टू जी ने नवभारत टाइम्स से बातचीत में कहा, “भारत दुनिया में भूजल दोहन में सबसे आगे है। हम हर साल बारिश का सिर्फ 12% पानी ही सहेज पाते हैं, बाकी बह जाता है। दनियावां में स्थिति और गंभीर है क्योंकि यहां प्राकृतिक जल स्रोतों की हम खुद उपेक्षा कर रहे हैं।”बताते चलें कि अपने फतुहा के आवास के बड़े छत पर ही उन्होंने बगीचा लगा दिया है जिसमें फलदार,फूलदार और सब्जियों के पौधे भी हैं।वे फुरसत के क्षणों में खुद इन पौधों को हरा-भरा रखने के लिए सिंचाई करते हैं।जन्मभूमि सरथुआ में भी उन्होंने इस धरती माँ की सेवा में वृक्षारोपण कर इसे संरक्षण दिया है।
*जल-नल योजना की लापरवाही से पानी की बर्बादी*
उन्होंने जल-नल योजना पर सीधा सवाल उठाया। “कई जगह नल खुले छोड़ दिए जाते हैं, पाइप टूटे हैं, लेकिन मरम्मत नहीं होती। नतीजा ये कि कीमती पानी यूं ही सड़क पर बह जाता है। सरकारी योजना का मकसद लोगों तक पानी पहुंचाना है, बर्बाद करना नहीं। पंचायत और विभाग को रोज निगरानी करनी होगी,”!
*सरोवर सूखे, पेड़ कटे, कुएं पटे*
बिशन बिट्टू जी के मुताबिक दनियावां के पुराने कुएं अब ज्यादातर सूख चुके हैं या मिट्टी-पत्थर से भर दिए गए हैं। गांवों के पोखर और सरोवर भी अतिक्रमण और सिल्ट से पट रहे हैं। इसका असर पशु-पक्षियों पर सबसे पहले दिख रहा है। “पहले पक्षी इन्हीं पोखरों पर आते थे। अब पानी नहीं तो वो भी गांव छोड़ रहे हैं,” उन्होंने कहा।
सड़क निर्माण के नाम पर हरे-भरे पेड़ों की कटाई को भी उन्होंने बड़ी चूक बताया। “पेड़ ही बारिश खींचते हैं, भूजल बचाते हैं। पेड़ काटकर हम गर्मी और जल संकट दोनों को दावत दे रहे हैं।”
*समाधान: वर्षा जल संचयन और वृक्षारोपण*
श्री बिट्टू जी ने कहा कि समाधान प्रकृति के पास ही है। “हर घर, स्कूल, पंचायत भवन में वर्षा जल संचयन और सोख्ता गड्ढे बनाएं। छत का पानी जमीन में उतारें। मानसून में बड़े पैमाने पर घने पेड़ लगाएं – खासकर पीपल, बरगद, नीम, पाकड़ जैसे देशी पेड़।”
उन्होंने युवाओं और बुद्धिजीवियों से अपील की कि जल बचत को जन आंदोलन बनाएं। “स्कूलों में बच्चों को बताएं कि एक बूंद का क्या मतलब है। सोशल मीडिया पर जल संरक्षण की बात फैलाएं। अगर आज हम नहीं चेते तो कल की पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।”
प्रखंड प्रशासन ने कहा है कि जल संरक्षण को लेकर जल्द जागरूकता अभियान चलाया जाएगा और सूखे जल स्रोतों के जीर्णोद्धार की योजना बनाई जा रही है।


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