बचपन की यादें - सरथुआ से तोप तक का वो सुनहरा सफर*
*बचपन की यादें - सरथुआ से तोप तक का वो सुनहरा सफर*
_कहानी *1995-2000 की*, जब हम बच्चे थे, पर दिल के बादशाह थे
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मानेशर(हरियाणा) से सरथुआ,दनियावां प्रखंड के प्रवासी बिहारी श्री राकेश कुमार की यूथ एजेंडा में प्रकाशन के लिए भेजी बचपन की यादों को समेटे मर्मस्पर्शी स्टोरी!
💞💞🌈🌈 मशहुर गजल गायक,अपनी मखमली आवाज के लिए चर्चित जगजीत सिंह ने लिखा है----!
💞💞🪴🪴🌹🌹🌧️ये दौलत भी ले लो,ये शोहरत भी ले लो,भले छीन लो मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो,वो बचपन की यादें,वो कागज की कश्ती
वो वारिश का पानी।🌹🌹💞💞🌧️🌧️🌈🦈🦈🐟🐡🐡--
यूथ एजेंडा के लिए राकेश की यादों को समेटे डॉ0 राजीव नयन की रिपोर्ट!🐟🐟⛵⛵⛵
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जननी जन्मभूमि स च ,स्वर्गादपि गरियशी,
मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है।
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तो पेश है श्री राकेश जी की यादें।सामजिक कार्यकर्ता जीवनबीमा अभिकर्ता मुकेश कुमार इनके अग्रज हुए।🏏🏏
कहानी किसी किताब की नहीं,
ये कहानी है तोप के बगीचा की,
देवी स्थान के मैदान की,
और उस नदी की, जो स्कूल और घर के बीच दीवार बन जाती थी।
*दोस्तों की टोली - पूरी फौज थी हमारी*
हम सब एक-दो क्लास आगे-पीछे,
पर दिल एक ही क्लास में।
पढ़ते थे *तोप हाई स्कूल* में,
पर असली पढ़ाई तोप के बगीचा में क्रिकेट खेलकर होती थी।
*तोप के बगीचा में हमारा वर्ल्डकप होता था।*
बल्ला एक, गेंद फटी हुई, स्टम्प ईंट के।
पर शोर ऐसा जैसे ईडन गार्डन हो।
देवी स्थान पर शाम को सबका जमावड़ा,
कोई जीता नहीं, कोई हारा नहीं, बस दोस्ती जीतती थी।
*और वो नदी... वो बद्री जी की नाव...*
स्कूल के जस्ट बगल में जो नदी थी,
बरसात में वो नदी नहीं, समंदर बन जाती थी।
लगभग 2 महीने, रास्ता बंद।
तब आती थी बद्री जी की नाव।
*बद्री जी - हम सबका गाली वाला प्यारा मल्लाह।*
नाव पर लड़का-लड़की दोनों,
9th-10th वाले हम सब एक साथ, एक कोने में।
ताकि अगर नाव डूबे भी, तो कोई अकेला न डूबे।
और जैसे ही नाव बीच मझधार में आती...
मीटिंग पहले से फिक्स थी!
एक इशारा, और दोनों साइड से नाव हिलाना शुरू।
*"ऐ... हिलो रे... और हिलो"*
नाव डगमग... पानी अंदर... और छपाक!
महीने में 4-5 बार तो नाव हम लोग जानबूझकर डुबा ही देते थे।
किताबें भीग जातीं, चप्पल बह जाती,
पर मजा ऐसा कि क्या बताएं।
बद्री जी खूब गाली देते थे ,
ऊपर से नीचे तक ऐसी-ऐसी गालियां,
जो डिक्शनरी में भी नहीं मिलेंगी।
पर सभी लोग गुस्सा होते ही नहीं थे,
उस गाली में भी प्यार लगता था,
उस डांट में भी आशीर्वाद लगता था।
हमलोग हंसते थे, वो भी अंदर से हंसते थे ।
*और वो सुबह-शाम का बहाना...*
5-6 की टोली बनती,
"फिर , शाम को नदी तरफ इधर - उधर की बाते करते - करते चला जाते थे "
माँ समझती थी बेटा बाहर जा रहा है,
और हमलोग सीधे नदी में...
घंटों तैराकी, एक-दूसरे को डुबाना,
नदी के किनारे घंटों गप्पे,
कोई टेंशन नहीं, कोई मोबाइल नहीं, कोई दिखावा नहीं।
आज सब बड़े हो गए,*
कोई टीचर बन गए , कोई प्रदेश चले गए अपने रोजी - रोटी की तलाश me , कोई किसान बन गए, कोई इंजिनियर बन गए ।
पर वो 1998-99 वाला लड़का आज भी अंदर जिंदा है।
वो बद्री जी की गाली आज भी याद आती है,*
*तो लगता है कोई अपना आशीर्वाद दे रहा है।*
*वो डूबी हुई नाव आज भी याद आती है,*
*तो लगता है जिंदगी वहीं पर सबसे ज्यादा तैर रही थी।*
*काश वो दिन फिर लौट आएं,*
*तोप के बगीचा में फिर से क्रिकेट हो,*
*देवी स्थान पर फिर से वो शोर हो,*
*और बद्री जी की नाव फिर से बीच नदी में डूबे...*
*और हम फिर से एक साथ भीग जाएं।*
_ये है सरथुआ के लड़कों की कहानी,_
_जो आज भी दिल में जवानी बनकर रहती है।_

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