स्वदेशी नववर्ष अपने जड़ों की ओर लौटें
शीर्षक: "स्वदेशी नव वर्ष: अपनी जड़ों की ओर लौटें" विषय: रामधारी सिंह 'दिनकर' जी के विचारों से प्रेरित एक काव्य रचना संदेश: "जब प्रकृति में न उल्लास है, न अंबर में वह प्रभात है, तो यह नव वर्ष कैसा? आइए, कैलेंडर की तारीखों से ऊपर उठकर अपनी संस्कृति और ऋतु चक्र के वास्तविक नव वर्ष को पहचानें।" काव्य-स्तंभ ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं, है अपना ये त्योहार नहीं, धुंध और कोहरे की चादर है, कहीं फूलों की मनुहार नहीं। अभी सूनी है उपवन की डाली, न कोयल की कूक सुनाई है, प्रकृति अभी निद्रा में सोई, न केसर की गंध समाई है। अभी तो ठिठुरी हुई रात है, सूरज भी कुछ सुस्त खड़ा, कहाँ खिला है अभी पलाश? कहाँ अभी अनुराग बढ़ा? जब अंबर की नीलिमा हंसे, और धरती नया श्रृंगार करे, जब शीतल मंद सुगंध पवन, सरसों के संग विहार करे। जब खेत की बाली मुस्काए, और हलधर के घर खुशहाली हो, वही तो अपना उत्सव है, जब हर घर में दिवाली हो। ये शोर-शराबा पश्चिमी है, इसमें अपनी प्रीत नहीं, बिन चैत्र के ढोल-मंजीरे, ये भारत का गीत नहीं। ऋतुराज का अब आह्वान करो, नव संवत् का सम्मान करो, जब सृष्टि रचेगी नया रूप, उस मं...